काव्य के साथ ‘शास्त्र’ शब्द का प्रयोग किस अर्थ में किया जाता है ?

काव्य के साथ ‘शास्त्र’ शब्द का प्रयोग

प्रारम्भ में, जैसा कि हम देख चुके हैं, इस शास्त्र का नाम केवल ‘काव्यालंकार’ था। शास्त्र शब्द का प्रयोग उसके साथ नहीं होता था। आगे उसका और अधिक विकास होने पर उसका महत्त्व बढ़ाने के लिए उसके साथ ‘शास्त्र’ शब्द का प्रयोग होने लगा। सामान्य रूप से ‘शास्त्र’ शब्द ‘शासनात् शास्त्रम्’ — अर्थात् शासन करने वाला होने से ‘शास्त्र’ कहलाता है। शासन का अर्थ मनुष्यों को किसी कर्म में प्रवृत्त करना या किसी कार्य से निवृत्त करना होता है। वेद, स्मृति, धर्मशास्त्र आदि ग्रन्थ मनुष्यों को सत्कर्म में प्रवृत्त होने और असत्कर्मों से निवृत्त होने का आदेश देते हैं, इसलिए वे ‘शास्त्र’ कहे जाते हैं। मुख्य रूप से प्रवृत्ति-निवृत्ति कराने वाले ग्रन्थ ‘शास्त्र’ कहलाते हैं।

                 काव्य का मुख्य प्रयोजन प्रवृत्ति-निवृत्ति नहीं, रसास्वादन या ‘सद्यः परिनिर्वृत्ति’ है। ‘कान्तासम्मितयोपदेशयुजे अर्थात् कर्तव्याकर्तव्य का उपदेश काव्य का गौण प्रयोजन है। इसलिए काव्य ‘प्रभुशब्दसम्मित’ वेद-शास्त्र आदि से भिन्न है। अतः ‘काव्यशास्त्र’ में प्रयुक्त ‘शास्त्र’ शब्द ‘शासनात् शास्त्रम्’ इस व्युत्पत्ति को लेकर प्रयुक्त नहीं हुआ है।

            वेदान्तदर्शन में ‘शास्त्र’ शब्द की एक और व्युत्पत्ति की गयी है। ‘शासनात् शास्त्रम्’ अर्थात् केवल शासन करने वाले विधि-प्रतिषेधपरक ग्रन्थ ही ‘शास्त्र’ नहीं कहलाते, अपितु किसी गूढ़ तत्त्व का  शंसन प्रतिपादन करने वाले ग्रन्थ भी ‘शास्त्र’ कहलाते हैं। इस व्युत्पत्ति के करने का कारण यह है कि वेदान्त प्रतिपाद्य विषय ‘ब्रह्म’ — प्रवृत्ति-निवृत्ति या विधि-प्रतिषेध का विषय नहीं माना गया है। तब उसका प्रतिपादन शास्त्र में कैसे सम्भव होगा? यह शङ्का ‘ब्रह्म’ के विषय में उठायी गयी है। उस शङ्का के निराकरण के लिए शंसनात् शास्त्रम्’ यह दूसरे प्रकार की व्युत्पत्ति भाष्यकार ने की है। इसके अनुसार ‘ब्रह्म’ जैसे गूढ़ तत्त्व का प्रतिपादन करने वाले वेदान्त आदि के लिए ‘शास्त्र’ शब्द का प्रयोग किया गया है। इस प्रकार शास्त्र शब्द केवल विधि-प्रतिषेधात्मक न होकर गूढ़ तत्त्व के प्रतिपादन का द्योतक भी माना गया है। इसी व्युत्पत्ति को लेकर अलंकारशास्त्र, काव्यशास्त्र आदि नामों में ‘शास्त्र’ शब्द का प्रयोग हुआ है। काव्य के साथ ‘शास्त्र’ शब्द का सम्बन्ध जुड़ जाने से उसका महत्त्व बहुत अधिक बढ़ गया। प्राचीन नाम ‘काव्यालंकार’ में उतना महत्त्व प्रतीत नहीं होता है जितना ‘काव्यशास्त्र’ या ‘अलंकारशास्त्र’ नामों में प्रतीत होता है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!