रसदेवताः
श्रृङ्गारो विष्णुदैवत्यो हास्यः प्रमथदैवतः।
रौद्रो रुद्राधिदैवत्यः करुणो यमदैवतः।।
वीभत्सस्य महाकाल: कालदेवो भयानक:।
वीरो महेन्द्रदेव: स्यादद्भुतो ब्रह्मदैवतः।।
(स्रोतम्- “नाट्यशास्त्रं षष्ठोऽध्यायः”)
हिन्दी में अर्थ- रसों के अधिदेवता
श्रृंगार रस के देवता भगवान विष्णु हैं।
हास्य रस के देवता प्रमथगण (शिवगण) हैं।
रौद्र रस के देवता रुद्र (शिव) हैं।
करुण रस के देवता यमराज हैं।
वीभत्स रस के देवता महाकाल हैं।
भयानक रस के देवता काल हैं।
वीर रस के देवता इन्द्र माने गए हैं।
अद्भुत रस के देवता ब्रह्मा हैं।
रसवर्णाः
श्यामो भवति श्रृङ्गार: सितो हास्यः प्रकीर्तितः।
कपोतः करुणश्चैव रक्तो रौद्रः प्रकीर्तितः।।
गौरो वीरस्तु विज्ञेयः कृष्णश्चैव भयानकः ।
नीलवर्णस्तु बीभत्सः पीतश्चैवाद्भुतः स्मृतः।।
(स्रोतम्- “नाट्यशास्त्रं षष्ठोऽध्यायः”)
हिन्दी में अर्थ – रसों के रंग
श्रृंगार रस का रंग श्याम (नीलाभ/गहरा) होता है।
हास्य रस का रंग श्वेत (सफेद) माना गया है।
करुण रस का रंग कपोतवर्ण (कबूतर जैसा धूसर) है।
रौद्र रस का रंग लाल बताया गया है।
वीर रस का रंग गौर (हल्का पीला/स्वर्णिम आभा) माना जाता है।
भयानक रस का रंग काला है।
वीभत्स रस का रंग नीला कहा गया है।
अद्भुत रस का रंग पीला माना गया है।