इन्द्रसूक्त(2.12), द्वितीय मण्डल, सूक्तसंख्या-12

                                    इन्द्र सूक्त

        मण्डल-                                                 सूक्त-12

       छन्द-त्रिष्टुप्                                               देवता-इन्द्र

       ऋषि-गृत्समद                                            मन्त्र-15

 

          यो जाप्र॑मो मनऺस्वान्देवो देवान्क्रतु॑ना र्यभू॑षत्

         स्य शुष्माद्रोदऺसी अभ्यऺसेतां नृम्णस्य॑ ह्ना स जऺनान्द्रः॑॥(१)

हे मनुष्यो! जिसने उत्पन्न होते ही देवों एवं मनुष्यों में प्रथम स्थान प्राप्त करके अपने वीर कर्म से देवों   

को विभूषित किया था, जिसके बल से धरती और आकाश डर गए थे और जो विशाल सेना के नायक थे, वही इंद्र हैं. (१)

          यः पृ॑थिवीं व्यथऺमानामऺदृंद्यः पर्व॑तान्प्रकु॑पितां अर॑म्णात्

         यो न्तरि॑क्षं विमे वरी॑यो  यो द्यामस्त॑भ्नात्स ज॑नान्द्रः॑ ॥(२)

हे मनुष्यो! जिसने चंचल पृथ्वी को दृढ़ किया, क्रोधित पर्वतों को नियमित किया, विशाल अंतरिक्ष को बनाया एवं आकाश को स्थिर किया, वही इंद्र हैं. (२)

        यो त्वाहिमरिऺणात्सप्त सिन्धून्यो गा दाज॑दधा लस्यऺ।

       यो अश्म॑नोन्तग्निं जानऺ संवृक्सत्सु स जऺना इन्द्रः॑॥(३)

हे मनुष्यो! जिसने वृत्र को मारकर सात नदियों को बहाया, जिसने बल असुर द्वारा रोकी गई गायों को स्वतंत्र किया, जिसने दो बादलों के घर्षण से बिजली रूपी अग्नि को उत्पन्न किया एवं जो युद्धस्थल में शत्रुओं का विनाश करता है, वही इंद्र है (३)

       येनेमा विश्वा च्यव॑ना कृतानि यो दासंर्णध॑रं गुहाक॑:

       श्वघ्नी यो जि॑गीवां क्षमाद॑र्यः पुष्टानिज॑नान्द्र॑:॥(४)

हे मनुष्यो! जिसने नश्वर संसार को बनाया है एवं जिसने विनाशक असुर को अंधेरी गुहा में बंद किया, जिस प्रकार बहेलिया मारे हुए पशु को ले जाता है, उसी प्रकार जो जीते हुए शत्रु का सब धन अधिकार में कर लेता है, वही इंद्र हैं. (४)

      यं स्मा॑ पृच्छन्ति कु सेतिऺ घोमुतेमा॑हुर्नैषो स्तीत्ये॑नम्

      सो अ॒र्यः पुष्टीर्विजऺ वा मिऺनाति श्रदऺस्मै त्त॒ स जऺनान्द्रः॑ ॥ (५)

हे मनुष्यों! जिसके विषय में लोग पूछते हैं कि वह कहां है? जिसके विषय में लोग कहते हैं कि वह नहीं है. जो शत्रु की संपत्ति को नष्ट करता है, वही इंद्र हैं. उनके प्रति श्रद्धा करो. (५)

      यो रध्रस्य॑ चोदिता यः कृस्य यो ब्रह्मणो नाधऺमानस्य कीरेः।

      युक्तग्रा॑व्णो यो॑विता सु॑शिप्रः सुतसो॑स्य स ज॑ना इन्द्रः॑॥ (६)

हे मनुष्यो! जो संपन्न व्यक्ति को धन देता है, जो दीनदुर्बल अथवा प्रार्थना करते हुए स्तोता को धन प्रदान करता है, जो शोभन हनु वाला, हाथ में पत्थर धारण करने वाले तथा सोम निचोड़ने वाले यजमान की रक्षा करता है, वही इंद्र हैं. (६)

      यस्याश्वा॑सः प्रदिशि यस्य॒ गावो स्य ग्रामास्य विश्वेथा॑सः

      यः सूर्यंसं जा यो अ॒पां नेता स ज॑नान्द्रः॑ ॥(७)

 हे मनुष्यो! समस्त अश्व, गाएं, गांव एवं रथ जिसके अधिकार में हैं, जिसने सूर्य एवं उषा को उत्पन्न किया और जो जल को बहने की प्रेरणा देता है, वही इंद्र हैं. (७)

      यं क्रन्द॑सी संती विह्वये॑ते॒ परेऽव॑भया॑ मित्रा॑:

      समानं चिद्रथऺमातस्थिवांसा नाना॑ हवेतेजऺना इन्द्रऺ: ॥(८)

हे मनुष्यो! शब्द करती हुई दो विरोधी सेनाएं, श्रेष्ठ एवं निम्न दोनों प्रकार के शत्रु एवं एक ही प्रकार के दो रथों पर बैठे हुए लोग जिसे अपनी सहायता के लिए बुलाते हैं, वही इंद्र हैं. (८)

       स्मान्न ते विजय॑न्ते जना॑सो यं युध्य॑माना अव॑से हव॑न्ते

       यो विश्वऺस्य प्रतिमानं॑ भू यो अ॑च्युच्युत्स ज॑नास॒ इन्द्रः॑ ॥(९)

हे मनुष्यो! जिसकी सहायता के बिना लोगों को विजय नहीं मिलती, युद्ध करते हुए लोग जिसे अपनी रक्षा के लिए बुलाते हैं, जो संसार के प्रतिनिधि बने थे एवं स्थिर पर्वत आदि को भी चंचल कर देते हैं, वही इंद्र हैं. (९)

      यः शश्व॑तोह्येनो दधा॑नानमऺन्यमानाञ्छर्वा॑ घान॑ ।

      यः शर्ध॑ते नानुददा॑ति शृध्यां यो दस्यो॑र्हन्ता स ज॑ना इन्द्र॑: ॥ (१०)

हे मनुष्यो! जिसने बहुत से पापी एवं अयाजक जनों का नाश किया, जो गर्व करने वाले को सिद्धि प्रदान नहीं करते एवं जो दस्युओं का हनन करने वाले हैं, वही इंद्र हैं. (१०)

     यः शम्ब॑रं पर्व॑तेषु क्षिन्तं॑ चत्वारिंश्यां द्यन्ववि॑न्दत्

     ओजामा॑नं यो अहिं॑ घादानुं या॑नं स ज॑नास॒ इन्द्रः॑॥ (११)

हे मनुष्यो! जिसने पर्वतों में छिपे हुए शंबर असुर को चालीसवें वर्ष में प्राप्त किया था, जिसने बल प्रयोग करने वाले पर्वत में सोए हुए दनु नामक असुर को मारा था, वही इंद्र हैं. (११)

     यः प्तर॑श्मिर्वृभस्तुवि॑ष्मावासृ॑त्सर्त॑वे स॒प्त सिन्धू॑न्

     यो रौ॑हिणमस्फु॑द्वज्र॑बाहुर्द्यामारोह॑न्तंज॑ना  इन्द्रः॑ ॥(१२)

हे मनुष्यो ! जो सात रश्मियों वाले, कामवर्षी एवं बलवान् हैं, जिन्होंने सात नदियों को बहाया है और जिन्होंने हाथ में वज्र लेकर स्वर्ग जाने को तत्पर रोहिण असुर का विनाश किया, वही इंद्र हैं. (१२)

     द्यावा॑ चिदस्मै पृथिवी न॑मेते शुष्मा॑च्चिदस्य पर्व॑ता भयन्ते

     यः सो॑पा नि॑चितो वज्र॑बाहुर्यो वज्र॑स्तः स ज॑ना इन्द्रः॑ ॥(१३)

हे मनुष्यो ! धरती और आकाश जिसके सामने झुकते हैं, जिसकी शक्ति के कारण पर्वत डरते हैं और जो सोमपानकर्ता, सबसे अधिक दृढ़ शरीर वाला, वज्र के समान दृढ़ भुजाओं वाला एवं हाथ में वज्र धारणकर्त्ता है, वही इंद्र हैं. (१३)

      यः सुन्वन्तवऺति यः पच॑न्तं यः शंस॑न्तं यः श॑मामूती

      यस्य ब्रह्म वर्ध॑नंस्य सोमोस्येदं राधः स ज॑ना इन्द्रः॑ ॥(१४)

हे मनुष्यो। जो सोमरस निचोड़ने वाले यजमान, पुरोडाश पकाने वाले व्यक्ति, स्तुति रचना करने वाले एवं पढ़ने वाले की रक्षा करता है, हमारा अन्न, सोम एवं स्तोत्र जिसे बढ़ाने वाले हैं, वही इंद्र हैं. (१४)

      यः सु॑न्वते पच॑ते दुध्र चिद्वाजं दर्द॑र्षि स किला॑सि त्यः

      यं तऺ इन्द्र विश्वहऺ प्रियासः॑ सुवीरा॑सो विमा वऺदेम(१५)

हे दुर्धर्ष इंद्र! तुम सोमरस निचोड़ने वाले एवं पुरोडाश पकाने वाले यजमान की रक्षा करते हो, अतः तुम सच्चे हो. हम प्रिय एवं वीर पुत्रों से युक्त होकर बहुत दिनों तक तुम्हारी स्तुतियों का पाठ करेंगे ।(१५)

 

नोट- ‘हिरण्यगर्भसूक्त 10.121′ को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें-

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!