काव्यशास्त्र एवं नामकरण
काव्य सौन्दर्य की परख करने वाले शास्त्र का नाम ‘काव्यशास्त्र’ है। काव्यशास्त्र के प्रारम्भिक युग में इसके लिए मुख्यतः ‘काव्यालङ्कार’ शब्द का प्रयोग होता था। इसीलिए काव्यशास्त्र के आदि ग्रन्थों के सभी आचार्यों ने अपने ग्रन्थों का नाम ‘काव्यालङ्कार’ रखा है। भामह का कारिकारूप में लिखा हुआ काव्यशास्त्र का आदि ग्रन्थ ‘काव्यालङ्कार’ नाम से ही प्रसिद्ध है। उद्भट ने भी अपने ग्रन्थ का नाम ‘काव्यालङ्कारसारसङ्ग्रह’ रखा है। रुद्रट के काव्यशास्त्रविषयक ग्रन्थ का नाम भी ‘काव्यालङ्कार’ है। वामन ने सूत्ररूप में लिखे हुए अपने ग्रन्थ का नाम भी ‘काव्यालङ्कारसूत्र’ रखा। इस प्रकार हम देखते हैं कि प्राचीनकाल में ‘काव्यशास्त्र’ के लिए ‘काव्यालङ्कार’ नाम ही अधिक प्रचलित पाया जाता है। इस नाम में आया हुआ ‘अलङ्कार’ शब्द सौन्दर्य अर्थ का बोधक है। वामन ने “सौन्दर्यमलङ्कारः” [1]सूत्र लिखकर अलङ्कार शब्द की सौन्दर्यपरक प्रतिष्ठा की है। अन्य सभी आचार्यों ने भी काव्य के सौन्दर्यवर्धक धर्मों को ही ‘अलङ्कार’ नाम से व्यवहृत किया है। “काव्यशोभाकरान् धर्मानलङ्कारान् प्रचक्षते”[2] आदि वचन भी इसी मत की पुष्टि करते हैं।
इस प्रकार ‘काव्यालङ्कार’ शब्द का अर्थ काव्य-सौन्दर्य होता है और उससे लक्षणा द्वारा काव्यसौन्दर्य के प्रतिपादक शास्त्र का ग्रहण होता है। इसीलिए काव्यसौन्दर्य की परीक्षा के आधारभूत मौलिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन करनेवाले ये सब प्राचीन ग्रन्थ ‘काव्यालङ्कार’ नाम से कहे जाते हैं। इन ग्रन्थों में केवल अलङ्कारों का ही वर्णन नहीं है, अपितु सौन्दर्य की परीक्षा के लिए गुण, दोष, रीति, अलङ्कार आदि जिन-जिन तत्त्वों के ज्ञान की आवश्यकता है, उन सभी का प्रतिपादन किया गया है। इसीलिए इन नामों में आये हुए ‘अलङ्कार’ शब्द को सौन्दर्य का द्योतक मानकर काव्यसौन्दर्य के प्रतिपादक शास्त्र के लिए ‘काव्यालङ्कार’ नाम का प्रयोग उचित प्रतीत होता है।
बाद में अनेक स्थलों पर इस शास्त्र के लिए ‘काव्यालङ्कार’ के बजाय केवल ‘अलङ्कारशास्त्र’ नाम का प्रयोग ही पाया जाता है। ‘प्रतापरुद्रीय’ की टीका में ‘अलङ्कारशास्त्र’ नाम के प्रतिपादन के लिए ‘छत्रिन्याय’ का अवलम्बन किया गया है। उन्होंने लिखा है —“यद्यपि रसालङ्काराद्यनेकविषयमिदं शास्त्रं तथापि छत्रिन्यायेन अलङ्कारशास्त्रमुच्यते”[3]
इसका अर्थ यह हुआ कि यद्यपि इस शास्त्र में रस, गुण, दोष, अलङ्कार आदि अनेक विषयों का विवेचन किया गया है परन्तु ‘छत्रिन्याय’ से उसे केवल ‘अलङ्कारशास्त्र’ कहा जाता है। ‘छत्रिन्याय’ का अभिप्राय यह है कि कहीं बहुत से व्यक्ति जा रहे हैं, उनमें दो-चार या एक-दो व्यक्ति छाता लगाये हुए, छत्रधारी हैं, उन दो-चार छत्रधारी व्यक्तियों की प्रधानता मानकर उनके साथ चलनेवाले छत्ररहित अन्य अनेक व्यक्तियों का भी ‘छत्रिणो यान्ति’ आदि पदों से ग्रहण हो जाता है और व्यवहार उन दो-चार छातेवालों के कारण उस समुदाय के अनेक छत्ररहित व्यक्तियों को भी ‘वे छातेवाले जा रहे हैं’ इस प्रकार कहा जाता है। इसी तरह अलङ्कारशास्त्र में अलङ्कार के अतिरिक्त रसादि अनेक विषयों का प्रतिपादन होते हुए भी अलङ्कार को प्रधान मानकर ‘अलङ्कारशास्त्र’ नाम से उनका ग्रहण हो जाता है। यह ‘प्रतापरुद्रीय’ के टीकाकार का अभिप्राय है। अलङ्कारशास्त्र नाम की व्याख्या के विषय में अन्य विद्वानों का भी प्रायः यही मत है।
परन्तु हमें यह व्याख्या अधिक रुचिकर प्रतीत नही होती। इसका कारण यह है कि काव्य में अलङ्कार की प्रधानता नहीं है; वह काव्य का आत्मा नहीं है, काव्य का आत्मा तो रस है। अलङ्कारों की स्थिति तो केवल कटक-कुण्डल आदि के समान गौण है। कटक-कुण्डल आदि मनुष्य के उत्कर्षाधायक धर्म तो हो सकते हैं, जीवनाधायक नहीं। कटक-कुण्डल आदि अलङ्कारों को धारण करने वाला व्यक्ति बड़ा आदमी माना जा सकता है, परन्तु उनके हटा देने पर या उनसे रहित व्यक्ति मनुष्य न रहे यह नहीं हो सकता है। शरीर का जीवनाधायक तत्त्व आत्मा है, इसी प्रकार काव्य का जीवनाधायक तत्त्व रस है। इसीलिए रसादि तत्त्वों को गौण करके और गौण अलङ्कारों को प्रधान मानकर उनके आधार पर इस शास्त्र का ‘अलङ्कारशास्त्र’ यह नामकरण उचित प्रतीत नहीं होता। इसीलिए हम इस व्याख्या के पक्ष में नहीं हैं। हमारे विचार में वामन के मतानुसार ‘अलङ्कार’ शब्द को सौन्दर्यपरक मानकर अलङ्कारशास्त्र को ‘सौन्दर्यशास्त्र’ या ‘काव्यसौन्दर्यशास्त्र’ मानना अधिक संगत और उचित प्रतीत होता है।
[1] काव्यालङ्कारसूत्र 1-2
[2] काव्यादर्श-2-1
[3] प्रतापरुद्रीय-टीका, पृ. 3।