‘अनुप्रास अलंकार’
मम्मटानुसारं लक्षणम्-
“वर्णसाम्यमनुप्रासः”
स्वरवैसादृश्येऽपि व्यञ्जनसदृशत्वं वर्णसाम्यम्। रसाद्यनुगतः प्रकृष्टो न्यासोऽनुप्रासः॥
हिन्दी अर्थ- वर्णों की समानता को अनुप्रास कहा जाता है। स्वरों का भेद होने पर भी केवल व्यंजनों की समानता ही वर्णों की समानता है। रस आदि के अनुकूल वर्णों का प्रकृष्ट सन्निवेश अनुप्रास कहलाता है।
सरलभाषा में भावार्थ- जब किसी वाक्य या पद्य में एक जैसे अक्षर (विशेषकर व्यंजन) बार-बार आते हैं और सुनने में मधुरता (संगीत जैसा प्रभाव) पैदा करते हैं, तो उसे अनुप्रास अलंकार कहते हैं।
👉 अनुप्रास अलंकार से संबन्धित महत्वपूर्ण नियम एवं जानकारियाँ-
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- व्यंजन (क, ख, ग, च, त आदि) की समानता जरूरी होती है।
- स्वर (अ, आ, इ, ई, उ, ऊ आदि) अलग हो सकते हैं अर्थात् स्वर की समानता की अनिवार्यता नही होती है।
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- अनुप्रास अलंकार का मुख्य उद्देश्य भाषा को सुन्दर, मधुर और प्रभावशाली बनाना है।
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- जब एक ही ध्वनि बार-बार आती है, तो वाक्य में लय (rhythm)और संगीतात्मकता उत्पन्न होती है।
उदाहरण सहित समझें
उदाहरण –(अ)
👉 चंचल चितवन चुरा ले गई।
🔍 अलंकार की पहचान:
👉यहाँ “च” ध्वनि बार-बार आई है इसलिए यह अनुप्रास अलंकार है
उदाहरण -(ब)
👉वन्देमातरम्।
सुजलां सुफलां मलयजशीतलाम्,
शस्यश्यामलां मातरम्।
वन्दे मातरम्॥
🔍 अलंकार की पहचान:
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- सुजलां सुफलां
👉 यहाँ ‘स’ वर्ण की पुनरावृत्ति हो रही है
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- सुजलां
- सुफलां
✔ इसलिए यहाँ अनुप्रास अलंकार है।
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- शस्यश्यामलां
👉 यहाँ ‘श’ वर्ण की बार-बार आवृत्ति हो रही है
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- शस्य
- श्यामलां
✔ अतः यहाँ भी अनुप्रास अलंकार है।
✅ निष्कर्ष: उपर्युक्त उदाहरणों में प्रमुख रूप से अनुप्रास अलंकार इन स्थानों पर है—
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- चंचल चितवन चुरा(च-वर्ण की आवृत्ति)
- सुजलां सुफलां (स-वर्ण की आवृत्ति)
- शस्यश्यामलां (श-वर्ण की आवृत्ति)
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