शिवसङ्कल्पसूक्तम्(अध्याय-34
सम्बन्धित वेद – शुक्ल यजुर्वेद अध्याय – 34
कुल मन्त्र – 6 देवता – मन
ऋषि – याज्ञवल्क्य छन्द – त्रिष्टुप्
यज्जा॒ग्रतो॑ दू॒रमु॑दैति॒ दैवं॒ तदु॑ सुप्त॒स्य तथै॒वैति॑ ।
दू॒रंग॑मं॒ ज्योति॑षां॒ ज्योति॒रेकं॒ तन्मे॒ मनः॑ शिवसंकल्पमस्तु ॥१॥
हिन्दी व्याख्या : जो मन जाग्रत अवस्था में दूर-दूर तक विचरण करता है और निद्रा में भी सक्रिय रहता है, जो समस्त प्रकाशों का भी प्रकाश है, वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।
येन॒ कर्मा॑ण्यप॒सो म॑नी॒षिणो॒ यज्ञे॑ कृ॒ण्वन्ति॑ विद॒थेषु॒ धीराः॑ ।
यद॑पूर्वं॒ यक्ष॑मन्तः प्र॒जानां॒ तन्मे॒ मनः॑ शिवसंकल्पमस्तु ॥२॥
हिन्दी व्याख्या : जिस मन के द्वारा ज्ञानी पुरुष यज्ञ और श्रेष्ठ कर्म करते हैं तथा जो समस्त प्राणियों में अद्भुत शक्ति के रूप में स्थित है, वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।
यत्प्र॒ज्ञान॑मु॒त चे॑तो॒ धृति॑श्च॒ यज्ज्योति॒रन्त॑रमृ॒तं प्र॒जासु॑ ।
यस्मा॒न्न ऋ॒ते किं॒चन॒ कर्म॑ क्रि॒यते॒ तन्मे॒ मनः॑ शिवसंकल्पमस्तु ॥३॥
हिन्दी व्याख्या : जो मन ज्ञान, चेतना और धैर्य का आधार है तथा जिसके बिना कोई भी कार्य नहीं हो सकता, वह मेरा मन कल्याणकारी संकल्प वाला हो।
येने॒दं भूतं॒ भुव॑नं भवि॒ष्यत् परि॑गृहीतममृ॒तेन॒ सर्वम्॑ ।
येन॑ य॒ज्ञस्ताय॑ते स॒प्तहो॑ता॒ तन्मे॒ मनः॑ शिवसंकल्पमस्तु ॥४॥
हिन्दी व्याख्या : जिस मन द्वारा भूत, वर्तमान और भविष्य सहित सम्पूर्ण जगत धारण किया जाता है और जिससे यज्ञ सम्पन्न होते हैं, वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।
यस्मि॒न्नृचः॒ साम॒ यजू॑ꣳषि॒ यस्मि॒न् प्रतिष्ठि॑ता रथना॒भाविवा॑राः ।
यस्मि॑ञ्चि॒त्तं सर्व॒मोतं॑ प्र॒जानां॒ तन्मे॒ मनः॑ शिवसंकल्पमस्तु ॥५॥
हिन्दी व्याख्या : जिस मन में ऋक्, साम और यजुः प्रतिष्ठित हैं तथा जिसमें समस्त प्राणियों का चित्त स्थित है, वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।
सु॒शार॑थिरश्वा॒निव॒ यन्म॑नु॒ष्यान्ने॑नीयतेऽभी॒शुभि॒र्वाजि॑न इव ।
हृत्प्र॑ति॒ष्ठं॒ यदजि॑रं॒ जवि॑ष्ठं॒ तन्मे॒ मनः॑ शिवसंकल्पमस्तु ॥६॥
हिन्द व्याख्या : जैसे कुशल सारथि घोड़ों को नियंत्रित करता है, वैसे ही मन मनुष्यों को मार्ग प्रदान करता है। जो मन हृदय में स्थित और अत्यन्त तीव्र गति वाला है, वह मेरा मन शुभ संकल्प वाला हो।