मातुराज्ञा गरीयसी

१. एकपदेन उत्तरत—

(क) एकशरीरसंक्षिप्ता का रक्षितव्या ?
उत्तरम्- पृथ्वी ।

(ख) शरीरे कः प्रहरति ?
उत्तरम्- अरिः।

(ग) स्वजनः कुत्र प्रहरति ?

उत्तरम्- हृदये ।
(घ) कैकेय्या:  भर्ता केन समः आसीत् ?
उत्तरम्- शक्रेण (इन्द्रेण) ।

(ङ) कः मातुः परिवादं श्रोतुं न इच्छति ?

उत्तरम्— रामः।

(च) केन लोकं युवतिरहितं कर्तुं निश्चयः कृतः ?
उत्तरम्— लक्ष्मणेन।

 

(छ) प्रतिमानाटकस्य रचयिता कः ?

उत्तरम्- महाकविः भासः।

 

२. पूर्णवाक्येन उत्तरत—

(क) रामस्य अभिषेकः कथं निवृत्तः ?

उत्तरम्-रामस्य अभिषेकः कैकेय्याः वचनात्        निवृत्तः।

(ख) दशरथस्य मोहं श्रुत्वा लक्ष्मणेन रोषेण किम् उक्तम् ?

उत्तरम्-दशरथस्य मोहं श्रुत्वा लक्ष्मणेन रोषेण-

 “यदि न सहसे राजो मोहं धनुः स्पृश मा दयां
स्वजननिभृतः सर्वोप्येवं मृदुः परिभूयते।
अथ न रुचितं मुञ्च त्वं मामहं कृतनिश्चयो
युवतिरहितं लोकं कर्तुं यतश्छलिता वयम्”

इति उक्तम्।

(ग) लक्ष्मणेन किं कर्तुं निश्चयः कृतः ?

उत्तरम्-लक्ष्मणेन  युवतिरहितं लोकं कर्तुं निश्चयः कृतः।

(घ) रामेण त्रीणि पातकानि कानि उक्तानि ?

उत्तरम्-रामेण त्रीणि पातकानि- “ताते धनुः ग्राह्यं, मातरि शरं मुञ्चनं, दोषेषु बाह्यम् अनुजं भरतं हननम्” इति उक्तानि।

 

 

(ङ) रामः लक्ष्मणस्य रोषं कथं प्रतिपादयति ?

उत्तरम्-रामः लक्ष्मणस्य रोषं-

त्रैलोक्यं दग्धुकामेव ललाटपुटसंस्थिता।

भृकुटिर्लक्ष्मणस्यैषा नियतीव व्यवस्थिता॥

 इति प्रतिपादयति।

 

३. रेखाङ्कितानि पदानि आधृत्य प्रश्ननिर्माणं कुरुत—

(क) मया एकाकिना गन्तव्यम्।

 प्रश्नः-  केन एकाकिना गन्तव्यम्?

(ख) दोषेषु बाह्यम् अनुजं भरतं हनानि।

प्रश्नः- केषु  बाह्यम् अनुजं भरतं हनानि ?

(ग) राज्ञा हस्तेन एव विसर्जितः।

प्रश्नः-केन हस्तेन एव विसर्जितः?

(घ) पार्थिवस्य वनगमननिवृत्तिः भविष्यति।
प्रश्नः- कस्य वनगमननिवृत्तिः भविष्यति?

(ङ) शरीरे अरिः प्रहरति।
प्रश्नः- कुत्र अरिः प्रहरति?

 

 

४. अधोलिखितेषु संवादेषु कः कं प्रति कथयति इति लिखत—

 

           संवादः                                      कः कथयति?         कं प्रति कथयति?

(क) एकशरीरसंक्षिप्ता पृथिवी रक्षितव्या।                 रामः                   काञ्चुकीयम्
(ख) अलमुपहतासु स्त्रीबुद्धिषु स्वमार्जवमुपनिक्षेप्तुम्।   काञ्चुकीयः         रामम्

(ग) नवनृपतिविमर्शे नास्ति शङ्का प्रजानाम्।            रामः                  काञ्चुकीयम्
(घ) रोदितव्ये काले सौमित्रिणा धनुर्गृहीतम्।               सीता                  रामम्

(ङ) न शक्नोमि रोषं धारयितुम्।                            लक्ष्मणः                रामम्

(च) एनामुद्दिश्य देवतानां प्रणामः क्रियते।                 सीता                    रामम्

(छ) यत्कृते महति क्लेशे राज्ये मे न मनोरथः।            लक्ष्मणः               रामम्

 

 

 

५. पाठमाश्रित्य ‘रामस्य’, ‘लक्ष्मणस्य’ च चारित्रिक-वैशिष्ट्यं हिन्दी/अंग्रेजी/संस्कृतभाषया लिखत।

 

रामस्य चारित्रिक-वैशिष्ट्यम्

महाकवि भास द्वारा रचित प्रतिमानाटकम् के नाट्यांश में राम को आदर्श नायक के रूप में चित्रित किया गया है। उनके चरित्र में अनेक उच्च मानवीय गुणों का समन्वय दिखाई देता है, जिसके कारण वे ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहलाते हैं। प्रस्तुत नाट्यांश के आधार पर उनके व्यक्तित्व की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार से स्पष्ट होती हैं—

 

(क) संवेदनशील एवं मर्मज्ञ व्यक्तित्व– राम मानव-हृदय की गहरी समझ रखने वाले हैं। वे जानते हैं कि अपने लोगों द्वारा दिया गया दुःख सबसे अधिक पीड़ादायक होता है। जब काञ्चुकीय उन्हें यह कहकर सावधान करता है कि महाराज को स्वजनों से बचाना चाहिए, तब राम उत्तर देते हैं कि स्वजन द्वारा पहुँचाया गया आघात सीधे हृदय पर लगता है और उसका प्रतिकार सम्भव नहीं होता। इससे उनकी गहन मनोवैज्ञानिक दृष्टि प्रकट होती है।

(ख) आदर्श मातृ-पितृभक्त– राम भारतीय संस्कृति के आदर्श पुत्र हैं। माता कैकेयी द्वारा वनवास दिए जाने पर भी वे उनके प्रति किसी प्रकार की कटुता प्रकट नहीं करते। वे उनकी निन्दा सुनना भी स्वीकार नहीं करते और उनके कार्य में भी कल्याण की भावना देखते हैं। इसी प्रकार पिता की आज्ञा को सर्वोपरि मानते हुए वे प्रसन्नतापूर्वक राज्य का त्याग कर वनगमन के लिए तैयार हो जाते हैं। इससे उनका मातृ-पितृभक्ति से पूर्ण चरित्र उजागर होता है।

 

(ग) भ्रातृप्रेम से ओत-प्रोत- राम अपने भाइयों के प्रति अत्यन्त स्नेहशील हैं। वे भरत को राज्य मिलने पर भी उन्हें दोषी नहीं मानते। लक्ष्मण के प्रति उनका विशेष स्नेह है, किन्तु जब लक्ष्मण क्रोधवश अनुचित बातें कहते हैं, तब राम उन्हें समझाने में भी पीछे नहीं हटते। वे धैर्यपूर्वक उन्हें क्रोध त्यागने की प्रेरणा देते हैं और परिवार की मर्यादा बनाए रखने का उपदेश देते हैं। इससे उनके संतुलित और उदार स्वभाव का परिचय मिलता है।

 

(घ) विनम्र एवं धैर्यशील स्वभाव- राम अत्यन्त विनयशील और धैर्यवान हैं। काञ्चुकीय तथा लक्ष्मण दोनों ही उन्हें क्रोधित करने का प्रयास करते हैं, किन्तु वे स्वयं संयमित रहते हैं। वे किसी भी परिस्थिति में उत्तेजना या आक्रोश का प्रदर्शन नहीं करते। अपनी मधुर वाणी और विवेकपूर्ण व्यवहार से वे लक्ष्मण के क्रोध को भी शान्त कर देते हैं। यह उनके धैर्य और वाक्चातुर्य का प्रमाण है।

 

 

(ङ) लोभरहित एवं त्यागमयी वृत्ति– राम के मन में राज्य या वैभव का कोई लोभ नहीं है। अयोध्या का राज्य उनसे छीनकर भरत को सौंप दिया जाता है, फिर भी वे बिना किसी विरोध के वन जाने के लिए तैयार हो जाते हैं। लक्ष्मण द्वारा विरोध करने पर भी वे उन्हें समझाते हैं और कैकेयी के निर्णय को भी शुभ मानते हैं। इससे उनका त्यागपूर्ण और निष्काम व्यक्तित्व प्रकट होता है।

इस प्रकार राम का चरित्र धैर्य, करुणा, विनय, त्याग, भ्रातृप्रेम तथा मातृ-पितृभक्ति जैसे महान गुणों से युक्त दिखाई देता है। यही कारण है कि वे भारतीय संस्कृति में आदर्श पुरुष और मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में प्रतिष्ठित हैं।

 

 

लक्ष्मणस्य वैशिष्ट्यम्

महाकवि भास रचित प्रतिमानाटकम् के इस नाट्यांश में लक्ष्मण को सहनायक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। उनका चरित्र राम के शांत, गंभीर और संयमित व्यक्तित्व से भिन्न दिखाई देता है। लक्ष्मण के स्वभाव में तेज, वीरता, भावुकता तथा भ्रातृभक्ति का अद्भुत समन्वय मिलता है। उनके चरित्र की प्रमुख विशेषताएँ निम्न प्रकार से स्पष्ट होती हैं—

 

(क).उग्र एवं तीव्र स्वभाव– लक्ष्मण अत्यन्त क्रोधी और आवेशपूर्ण स्वभाव के हैं। जब उन्हें यह ज्ञात होता है कि राम का राज्याभिषेक रोक दिया गया है और उन्हें वनवास दिया जा रहा है, तब वे अत्यधिक क्रोधित हो उठते हैं। वे माता कैकेयी को दण्डित करने के लिए धनुष उठा लेते हैं तथा राम को भी प्रतिकार के लिए प्रेरित करते हैं। उनका क्रोध इतना प्रबल है कि वे सम्पूर्ण पृथ्वी को युवतियों से रहित करने तक का संकल्प व्यक्त कर देते हैं। उनकी इसी उग्रता को देखकर राम भी कहते हैं कि क्रोधित लक्ष्मण मानो सैकड़ों लोगों के समान प्रतीत होते हैं।

 

(ख) अद्वितीय पराक्रम एवं वीरतालक्ष्मण केवल क्रोधी ही नहीं, अपितु अत्यन्त पराक्रमी भी हैं। उनमें अपने संकल्प को पूर्ण करने की क्षमता विद्यमान है। उनके शौर्य से राम और सीता दोनों परिचित हैं। यही कारण है कि उनके क्रोध को देखकर सभी चिन्तित हो जाते हैं। राम लक्ष्मण की भृकुटि को ऐसी प्रलयंकारी शक्ति के रूप में देखते हैं, जो सम्पूर्ण त्रैलोक्य को भस्म कर सकती है। इससे उनकी वीरता और युद्ध-कौशल का परिचय मिलता है।

 

(ग) धैर्यवान व्यक्तित्व– यद्यपि प्रस्तुत प्रसंग में लक्ष्मण का उग्र रूप अधिक दिखाई देता है, तथापि उनके भीतर धैर्य का गुण भी विद्यमान है। स्वयं राम उन्हें “धैर्यसागर” कहकर सम्बोधित करते हैं। इससे ज्ञात होता है कि सामान्य परिस्थितियों में लक्ष्मण गंभीर और संयमी हैं, किन्तु राम के प्रति अन्याय देखकर उनका धैर्य टूट जाता है।

 

(घ) आवेश के कारण अविवेक- लक्ष्मण का अत्यधिक क्रोध कभी-कभी उनके विवेक को ढक देता है। आवेश में वे यह भी भूल जाते हैं कि कैकेयी उनकी माता हैं। यही कारण है कि वे उनके विरुद्ध शस्त्र उठाने के लिए तैयार हो जाते हैं। इतना ही नहीं, वे सम्पूर्ण स्त्री समाज को दोषी मानकर पृथ्वी को युवतियों से रहित करने की बात तक कह देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि उनका क्रोध कई बार उन्हें अविवेकपूर्ण निर्णयों की ओर ले जाता है।

(ङ) अनुपम भ्रातृभक्ति– लक्ष्मण के चरित्र का सबसे उज्ज्वल पक्ष उनकी भ्रातृभक्ति है। वे राम से अत्यन्त प्रेम करते हैं और उनके दुःख को अपना दुःख मानते हैं। राम के वनवास का समाचार उन्हें भीतर तक व्याकुल कर देता है। वे अपने प्रिय भाई के साथ होने वाले अन्याय को सहन नहीं कर पाते। चौदह वर्षों तक राम के वन में रहने की कल्पना ही उन्हें विचलित कर देती है। उनका सम्पूर्ण क्रोध और आक्रोश वास्तव में राम के प्रति उनके गहरे प्रेम का ही परिणाम है। दूसरी ओर राम भी लक्ष्मण पर पूर्ण विश्वास रखते हैं और उन्हें अपना परम स्नेही मानते हैं।

                   इस प्रकार लक्ष्मण के चरित्र में उग्रता, वीरता, धैर्य, आवेश, पराक्रम तथा भ्रातृभक्ति जैसे क्षत्रियोचित गुणों का समन्वय दिखाई देता है। वे राम के प्रति समर्पण और निष्ठा के आदर्श प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किए गए हैं।

 

 

 

६. पाठात् चित्वा अव्ययपदानि लिखत, उदाहरणानि- ननु, तत्र …….।

उत्तर—
इति, अथ, कुतः, हन्त!, न, तत्र, हि, अत्र, कथम्, च, अलम्, एव, खलु, तावत्, अपि, यदि, ननु, अत्र, परम्, तत्, तत्समीपे, मा, पुनः, एवम्, यतः, इदानीम्, आः, वा, समम्, इव, इतः, हा!, धिक्, यत्, किल, तत्र।

 

 

७. अधोलिखितेषु पदेषु प्रकृति-प्रत्ययौ पृथक् कृत्वा लिखत—

परित्रातव्यः, वक्तव्यम्, रक्षितव्या, भवितव्यम्, पुत्रवती, श्रोतुम्, विसर्जितः, गतः, क्षोभितः, धारयितुम् ।

            पद                        प्रकृति                  प्रत्यय

परित्रातव्यः                 परि + त्रै (त्रा)     तव्य
वक्तव्यम्                   
वच्                   तव्य
रक्षितव्या                   रक्ष्                   तव्य
भवितव्यम्                 
भू                      तव्य
पुत्रवती                       पुत्र                    मतुप् (वत्/वती)
श्रोतुम्                       
श्रु                   तुमुन् (तुम्)
विसर्जितः                   वि + सृज्         क्त
गतः                         
गम्                    क्त
क्षोभितः                    
क्षुभ्                   क्त
धारयितुम्                  धृ                       णिच् + तुमुन् (तुम्)

८. अधोलिखितानां पदानां संस्कृत-वाक्येषु प्रयोगः करणीयः—

शरीरे,   प्रहरति,  भर्ता,  अभिषेकः,  पार्थिवस्य,  प्रजानाम्,  हस्तेन, धैर्यसागरः,  पश्यामि,  करेणु:,  गन्तव्यम्।

उत्तरम्—

 पदम् —                     संस्कृत-वाक्य-प्रयोगः

शरीरे — शरीरे बहूनि अस्थीनि सन्ति।
प्रहरति — व्याधः बाणेन प्रहरति।
भर्ता — ईश्वरः संसारस्य एकैव भर्ता अस्ति।
अभिषेकः — पिता पुत्रस्य अभिषेकं करोति।
पार्थिवस्य — समुद्रपर्यन्तं पार्थिवस्य राज्यम् आसीत्।
प्रजानाम् — राजा प्रजानाम् रक्षकः भवति।
हस्तेन — माता दण्डेन पुत्रं ताडयति।
धैर्यसागरः — लक्ष्मणः धैर्यसागरः आसीत्।
पश्यामि — अहं दूरदर्शनं पश्यामि।
करेणुः — करेणुः सरोवरे निमज्जति।
गन्तव्यम् — मया क्रीडाक्षेत्रं गन्तव्यम्।

 

९. अधोलिखितानां पद्यांशानां स्वभाषया भावार्थं लिखत—

 

 

(क) शरीरेऽरिः प्रहरति हृदये स्वजनस्तथा।

 हिन्दी अर्थ- शत्रु शरीर पर प्रहार करता है, उसी प्रकार अपने लोग (स्वजन) हृदय पर आघात करते हैं।

उत्तरम्— संसार में शत्रु और मित्र दोनों प्रकार के लोग होते हैं। शत्रु का आक्रमण सामान्यतः व्यक्ति के शरीर, धन अथवा बाह्य जीवन पर होता है। उससे बचने के अनेक उपाय उपलब्ध होते हैं। व्यक्ति उससे दूरी बना सकता है, उसके प्रति सतर्क रह सकता है, उसके आक्रमणों का प्रतिकार कर सकता है अथवा उसके षड्यन्त्रों को विफल कर सकता है। यदि शत्रु के कारण शारीरिक क्षति होती भी है, तो उसकी चिकित्सा और उपचार की व्यवस्था संभव होती है।

इसके विपरीत, जब कोई आत्मीयजन—जैसे परिवार का सदस्य, मित्र अथवा निकट सम्बन्धी—विश्वास को ठेस पहुँचाता है, तो उसका प्रभाव व्यक्ति के हृदय और मन पर पड़ता है। यह आघात बाह्य न होकर आन्तरिक होता है। ऐसी पीड़ा का कोई प्रत्यक्ष उपचार नहीं होता, क्योंकि वह शरीर पर नहीं, अपितु भावनाओं और विश्वास पर लगी होती है। समय बीत जाने पर भी उसकी स्मृतियाँ व्यक्ति को बार-बार व्यथित करती रहती हैं।

शत्रु की पहचान होने के कारण व्यक्ति उसके प्रति सदैव सावधान रहता है। उसे यह ज्ञात होता है कि शत्रु से किसी भी समय हानि पहुँच सकती है, इसलिए वह पहले से ही सतर्कता बरतता है। किन्तु आत्मीयजनों के विषय में ऐसा नहीं होता। उनके प्रति व्यक्ति के मन में विश्वास, स्नेह और अपनत्व का भाव होता है। इसी कारण वह उनके द्वारा पहुँचाई जाने वाली सम्भावित पीड़ा की कल्पना भी नहीं कर पाता। जब वही विश्वास का पात्र व्यक्ति आघात पहुँचाता है, तब उसकी वेदना और भी गहरी हो जाती है।

इस प्रकार, शत्रु द्वारा पहुँचाई गई शारीरिक हानि की अपेक्षा आत्मीयजनों द्वारा दिया गया मानसिक एवं भावनात्मक आघात अधिक कष्टदायक सिद्ध हो सकता है। अतः जीवन में प्रेम और विश्वास के साथ-साथ विवेक, आत्मसंयम तथा यथोचित सावधानी भी आवश्यक है, जिससे व्यक्ति सम्बन्धों की मर्यादा बनाए रखते हुए अनावश्यक दुःख से स्वयं को बचा सके।

 

(ख) नवनृपतिविमर्शे नास्ति शङ्का प्रजानाम्।         

हिन्दी अर्थ-  नए राजा के विषय में विचार-विमर्श होने पर प्रजा को कोई शंका नहीं होती।

उत्तरम्— राज्य में जब किसी नवीन शासक के अभिषेक की घोषणा होती है, तब प्रजा के मन में स्वाभाविक रूप से अनेक प्रकार के विचार और शंकाएँ उत्पन्न होने लगती हैं। वह यह जानने के लिए उत्सुक रहती है कि नया राजा किस प्रकार का शासक सिद्ध होगा। क्या वह न्याय, धर्म और लोककल्याण को प्राथमिकता देगा अथवा स्वार्थ और निरंकुशता का मार्ग अपनाएगा? शासन परिवर्तन के साथ जुड़ी यह अनिश्चितता प्रजा के मन में चिंता और असमंजस की स्थिति उत्पन्न कर सकती है।

ऐसी परिस्थिति में श्रीराम अत्यन्त उदात्त दृष्टिकोण का परिचय देते हैं। वे कैकेयी द्वारा अपने राज्याभिषेक को स्थगित किए जाने की घटना को केवल व्यक्तिगत हानि के रूप में नहीं देखते, बल्कि उसमें भी प्रजाकल्याण की सम्भावना का दर्शन करते हैं। उनके विचार में इस निर्णय का एक महत्त्वपूर्ण परिणाम यह होगा कि महाराज दशरथ ही अयोध्या के शासन का दायित्व संभालते रहेंगे।

महाराज दशरथ दीर्घकाल से राज्य का संचालन कर रहे थे। उनकी न्यायप्रियता, धर्मनिष्ठा और प्रजावत्सलता से समस्त प्रजा भली-भाँति परिचित थी। इसलिए उनके शासन में प्रजा स्वयं को सुरक्षित और निश्चिन्त अनुभव करती थी। यदि तत्काल कोई नया शासक नियुक्त होता, तो उसके स्वभाव और शासन-पद्धति को लेकर लोगों के मन में अनेक प्रकार की जिज्ञासाएँ और आशंकाएँ उत्पन्न हो सकती थीं।

इस प्रकार श्रीराम का चिंतन उनके त्याग, दूरदर्शिता और लोकमंगल की भावना को प्रकट करता है। वे अपने व्यक्तिगत अधिकार और प्रतिष्ठा से अधिक प्रजा के सुख, शान्ति और सुरक्षा को महत्त्व देते हैं। यही उनकी महानता तथा आदर्श नेतृत्व का परिचायक है।

Top of Form

 

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(ग) यदि  न सहसे राज्ञो मोहं धनुः स्पृश मा दयाम्।Top of Form

हिन्दी अर्थ-यदि तुम राजा के इस मोह (अविवेकपूर्ण निर्णय या पक्षपातपूर्ण व्यवहार) को सहन नहीं कर सकते, तो धनुष धारण करो और दया अथवा दुर्बलता का आश्रय मत लो।

उत्तरम् श्रीराम के वनवास का निर्णय महाराज दशरथ के लिए अत्यन्त दुःखद सिद्ध होता है। अपने प्रिय पुत्र से वियोग की कल्पना मात्र से वे इतने व्याकुल हो उठते हैं कि चेतना खोकर भूमि पर गिर पड़ते हैं। राजा की इस करुण दशा को देखकर समस्त राजपरिवार, मंत्रीगण तथा अयोध्या की प्रजा शोक और विषाद से भर उठती है। श्रीराम स्वयं धैर्य और संयम का परिचय देते हैं, किन्तु लक्ष्मण के हृदय में इस घटना के प्रति तीव्र रोष उत्पन्न हो जाता है।

लक्ष्मण इस सम्पूर्ण स्थिति का उत्तरदायी कैकेयी को मानते हैं। उनके विचार में कैकेयी की जिद और स्वार्थपूर्ण आग्रह ने न केवल श्रीराम को वनगमन के लिए विवश किया है, बल्कि महाराज दशरथ को भी असहनीय दुःख पहुँचाया है। इसलिए वे उपस्थित लोगों को अन्याय के विरुद्ध खड़े होने के लिए प्रेरित करते हैं। वे कहते हैं कि यदि राजा की यह दुःखपूर्ण अवस्था सबके लिए असह्य है, तो केवल शोक प्रकट करने से कार्य नहीं चलेगा; अन्याय का दृढ़तापूर्वक प्रतिरोध भी आवश्यक है।

अपने आवेश में लक्ष्मण यह भी कहते हैं कि इस विषय में कैकेयी के महारानी होने अथवा स्त्री होने का विचार नहीं किया जाना चाहिए। उनके अनुसार जब कोई व्यक्ति अपने अधिकारों का दुरुपयोग करके धर्म, न्याय और राज्यहित के विपरीत आचरण करता है, तब उसके पद या सामाजिक स्थिति के कारण उसके कृत्य को उचित नहीं ठहराया जा सकता। धर्म की रक्षा और अन्याय के प्रतिकार के लिए आवश्यक कदम उठाना ही उचित है।

इस प्रकार लक्ष्मण के वचनों में भ्रातृप्रेम, पितृभक्ति, धर्मनिष्ठा तथा अन्याय के प्रति असहिष्णुता का सशक्त समन्वय दिखाई देता है। उनका यह उग्र स्वर उनके उदात्त चरित्र, क्षत्रियोचित तेज और सत्य के प्रति अटूट निष्ठा का परिचायक है।

(घ) यत्कृते महति क्लेशे राज्ये मे न मनोरथः।

हिन्दी अर्थ- जिसके कारण इतना बड़ा दुःख और कष्ट उत्पन्न हुआ है, उस राज्य को प्राप्त करने की मेरी कोई इच्छा नहीं है।

उत्तरम्- राम के राज्याभिषेक को स्थगित कर उन्हें वनवास देने का निर्णय सुनकर लक्ष्मण का हृदय गहन शोक और रोष से भर उठता है। उनके उद्विग्न भावों को देखकर श्रीराम उन्हें समझाने का प्रयास करते हैं। वे कहते हैं कि यदि मेरे राज्याभिषेक का रुक जाना ही तुम्हारे दुःख का कारण है, तो बताओ, इस दुःख को दूर करने के लिए मैं किसके विरुद्ध कार्य करूँ—पिता के, माता के अथवा भरत के? श्रीराम का उद्देश्य लक्ष्मण के मन की वास्तविक स्थिति को जानना था।

इस पर लक्ष्मण विनम्रतापूर्वक अपनी भावना व्यक्त करते हुए कहते हैं कि उनकी वेदना का कारण राज्य नहीं है। जिस राज्य की प्राप्ति के लिए परिवार में इतना बड़ा संकट उत्पन्न हो गया हो और जिसके कारण महाराज दशरथ जैसे धर्मात्मा राजा को असह्य दुःख सहना पड़ रहा हो, उस राज्य के प्रति उनके मन में कोई आकर्षण नहीं है। राज्य मिले या न मिले, इससे उन्हें कोई विशेष सरोकार नहीं है।

वास्तव में लक्ष्मण को जो बात सबसे अधिक पीड़ा पहुँचा रही है, वह श्रीराम का वनवास है। वे यह स्वीकार करते हैं कि वे श्रीराम को चौदह वर्षों तक वन में कष्टमय जीवन व्यतीत करते हुए देखने की कल्पना भी नहीं कर सकते। उनके लिए श्रीराम केवल बड़े भाई ही नहीं, बल्कि आदर्श पुरुष, मार्गदर्शक और जीवन का आधार हैं। इसलिए उनका हृदय इस विचार से विदीर्ण हो रहा है कि श्रीराम को वन के दुःख, कष्ट और कठिनाइयों का सामना करना पड़ेगा।

अतः लक्ष्मण का क्रोध राज्य के खो जाने पर नहीं, बल्कि श्रीराम को होने वाले कष्ट पर केन्द्रित है। उनके वचनों में भ्रातृस्नेह, त्याग, निष्ठा और समर्पण की भावना अत्यन्त मार्मिक रूप से अभिव्यक्त होती है। यही कारण है कि वे राज्य-सुख को तुच्छ मानकर श्रीराम के दुःख को ही अपनी सबसे बड़ी व्यथा मानते हैं।

 

१०. अधोलिखितपदेषु सन्धिच्छेदः कार्यः—

रक्षितव्येति —        रक्षितव्या + इति
गुणेनात्र —           गुणेन + अत्र
शरीरेऽरिः —         शरीरे + अरिः
स्वजनस्तथा —     स्वजनः + तथा
येनाकार्यम् —       येन + अकार्यम्
खल्वस्मत् —       खलु + अस्मत्
किमप्यभिमतम् — किम् + अपि + अभिमतम्
हस्तेनैव —           हस्तेन + एव
दग्धुकामेव      –     दग्धुकामा+ इव

 

 

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