लघु गुरु वर्ण की व्यवस्था
एकमात्रिक स्वर अथवा व्यंजन लघु तथा एकाधिकमात्रिक गुरु होता है। यह एक सामान्य नियम है। परन्तु छन्दशास्त्र कुछ और परिस्थितियों में वर्णों की गुरुता स्वीकार करता है। इस सन्दर्भ में निम्नलिखित नियम को अच्छी तरह समझें और याद कर लें—
सानुस्वारो विसर्गान्तो दीर्घो युक्तपरश्च यः।
वा पादान्ते त्वसौ वर्णो ज्ञेयोऽन्यो मात्रिको लघुः॥
अन्वयः– यः वर्णः सानुस्वारः, विसर्गान्तः, दीर्घः, युक्तपरः वा पादान्ते च अस्ति, असौ गुरुः ज्ञेयः। अन्यः एकमात्रिकः वर्णः लघुः ज्ञेयः।
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- सानुस्वार = अनुस्वार से युक्त, जैसे— अं, कं आदि।
- विसर्गान्त = विसर्ग जिनके अन्त में है, जैसे— अः, कः आदि।
- दीर्घ = द्विमात्रिक अथवा प्लुत वर्ण, जैसे— भा, का, कृष्णाऽऽऽ आदि।
- युक्त-पर = युक्त अर्थात् संयुक्त वर्ण (Double Consonant) के पर अर्थात् आगे जिसके, वह पूर्ववर्ती वर्ण। जैसे— विष्णु शब्द में ष्णु (संयुक्त) का पूर्ववर्ती होने के कारण वि गुरु है।
- वा पादान्ते = चरण के अन्त में स्थित वर्ण विकल्प से लघु अथवा गुरु होता है। जैसे— ‘अलं महीपाल तव श्रमेण’ में लक्षण के अनुसार ण को गुरु होना चाहिए, अथवा विकल्प से (लघु होते हुए भी) उसे गुरु माना जायेगा।
हिन्दी अर्थ- जो वर्ण अनुस्वारयुक्त हो, विसर्गयुक्त हो, दीर्घ हो, संयुक्त व्यंजन से पहले स्थित हो अथवा चरण (पाद) के अन्त में हो, वह गुरु माना जाता है। इसके अतिरिक्त जो वर्ण एक मात्रा वाला हो, वह लघु माना जाता है।