मालिनी (प्रत्येक चरण में १५ अक्षर)
लक्षणम्- ननमयययुतेयं मालिनी भोगिलोकैः। (३/८७ वृत्तरत्नाकर)
गण-विन्यास
नगण – नगण – मगण – यगण – यगण
हिन्दी अर्थ- जिस छन्द के प्रत्येक चरण में पहले दो नगण, फिर एक मगण और उसके बाद दो यगण आते हैं। साथ ही प्रत्येक चरण में (भोगी-सर्प) ८वें और (लोक) ७वें अक्षर पर थोड़ा विराम (यति) दिया जाता है। ऐसे छन्द को मालिनी छन्द कहते हैं।
अतिरिक्त जानकारी– धर्मग्रन्थों में अनेक नागों का वर्णन मिलता है। परन्तु विशेष रूप से आठ प्रमुख नाग (अष्टनाग) प्रसिद्ध हैं—
- अनन्त (शेषनाग)
- वासुकि
- तक्षक
- कर्कोटक
- पद्म
- महापद्म
- शंख
- कुलिक
सप्तलोक (ऊर्ध्व के सात लोक) हिन्दू धर्मग्रन्थों के अनुसार निम्नलिखित हैं—
- भूर्लोक (भूः) – पृथ्वी, जहाँ मनुष्य एवं अन्य प्राणी निवास करते हैं।
- भुवर्लोक (भुवः) – पृथ्वी और स्वर्ग के मध्य का लोक; इसे अन्तरिक्ष भी कहते हैं।
- स्वर्लोक (स्वः) – देवलोक या इन्द्रलोक।
- महर्लोक (महः) – महर्षियों का निवास-स्थान।
- जनलोक (जनः) – ब्रह्मर्षियों एवं उच्च कोटि के ऋषियों का लोक।
- तपोलोक (तपः) – महान् तपस्वियों का लोक।
- सत्यलोक (सत्यम् / ब्रह्मलोक) – ब्रह्माजी का लोक; सातों लोकों में सर्वोच्च।
स्मरणीय क्रम
भूः → भुवः → स्वः → महः → जनः → तपः → सत्यम्
उदाहरणम्-
सरसिजमनुविद्धं शैवलेनापि रम्यं।
मलिनमपि हिमांशोर्लक्ष्म लक्ष्मीं तनोति।
इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी।
किमिव हि मधुराणां मण्डनं नाकृतीनाम्॥ (शाकु-1/20)
स्रग्धरा (प्रत्येक चरण में 21 अक्षर)
लक्षणम्
म्रभ्नैर्यानां त्रयेण त्रिमुनियतियुता स्रग्धरा कीर्तितेयम्॥ (3/104 वृत्तरत्नाकर)
गणविन्यास
मगण + रगण + भगण + नगण + यगण + यगण + यगण
हिन्दी अर्थ– जिस छन्द के प्रत्येक चरण में पहले मगण, फिर रगण, उसके बाद भगण, फिर नगण और अंत में तीन यगण आते हैं तथा प्रत्येक ७ अक्षरों के बाद विराम (यति) होता है, उस छन्द को स्रग्धरा कहते हैं।
अतिरिक्त जानकारी- छन्दशास्त्र में कई शब्दों का प्रयोग सांकेतिक संख्याओं (भूतसंख्या) के रूप में किया जाता है। मुनि शब्द से सप्तर्षियों का बोध होता है, इसलिए इसका संख्यात्मक मान ७ माना जाता है।
अतः ‘त्रिमुनियतियुता’ का तात्पर्य
- त्रि = तीन
- मुनि = सात
- यति = विराम
उदाहरणम्
ऽ ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ । । । । । । ऽ ऽ । ऽ ऽ । ऽ ऽ
या सृष्टिः स्रष्टुराद्या वहति विधिहुतं या हविर्या च होत्री।
ये द्वे कालं विधत्तः श्रुतिविषयगुणा या स्थिता व्याप्य विश्वम्।
यामाहुः सर्वबीजप्रकृतिरिति यया प्राणिनः प्राणवन्तः।
प्रत्यक्षाभिः प्रपन्नस्तनुभिरवतु वस्ताभिरष्टाभिरीशः॥ – ( शाकुन्तलम् 1/1)
शार्दूलविक्रीडितम् (प्रत्येक चरण में १९ अक्षर)
लक्षणम्
सूर्याश्वैर्मसजस्तताः सगुरवः शार्दूलविक्रीडितम्॥
(वृत्तरत्नाकर ३/१००)
गणविन्यास
मगण + सगण + जगण + सगण + तगण + तगण + गुरु
(म + स + ज + स + त + त + ग)
हिन्दी अर्थ– जिस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः मगण, सगण, जगण, सगण, तगण, तगण तथा अन्त में एक गुरु वर्ण होता है, उसे शार्दूलविक्रीडित छन्द कहते हैं। इस छन्द में १२वें (सूर्य) अक्षर पर पहली यति तथा शेष ७ (अश्व) अक्षरों के बाद दूसरी यति (अर्थात् चरण का अन्त) होती है।
अतिरिक्त जानकारी
- इस छन्द के प्रत्येक चरण में १९ अक्षर होते हैं।
- इसमें १२वें तथा ७वें अक्षर पर यति होती है। अर्थात् चरण का विभाजन १२ + ७ अक्षरों में होता है।
- यह संस्कृत के अत्यन्त लोकप्रिय एवं गम्भीर वृत्तों में से एक है। महाकवि कालिदास, माघ, श्रीहर्ष आदि ने इसका व्यापक प्रयोग किया है।
- ‘शार्दूलविक्रीडित’ का शाब्दिक अर्थ है— बाघ (शार्दूल) की क्रीड़ा के समान गम्भीर, प्रभावशाली और गरिमामय गति वाला छन्द।
- द्वादश आदित्य (१२ आदित्य) का उल्लेख विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण, भागवत पुराण आदि ग्रन्थों में मिलता है। सामान्यतः स्वीकृत द्वादश आदित्य निम्नलिखित हैं—
- धाता (धातृ)
- अर्यमा
- मित्र
- वरुण
- इन्द्र (शक्र)
- विवस्वान्
- पूषा
- पर्जन्य
- अंश (अंशुमान्)
- भग
- त्वष्टा
- विष्णु
सप्त अश्व का अर्थ है— सूर्यदेव के रथ को खींचने वाले सात घोड़े। वैदिक एवं पुराणिक परम्परा में सूर्य के रथ में सात अश्व बताए गए हैं। इन सात अश्वों के प्रतीकात्मक अर्थ अनेक प्रकार से किए गए हैं।
१. वैदिक प्रतीक
ऋग्वेद में सूर्य के रथ को सप्त अश्वों द्वारा संचालित बताया गया है। ये सात अश्व सात छन्दों, सात रंगों, सप्ताह के सात दिनों अथवा सूर्य की सात किरणों के प्रतीक माने जाते हैं।
२. छन्दशास्त्र में
सूर्य के रथ के सात अश्व माने जाते हैं जिस कारण से छन्दशास्त्र में अश्व शब्द का प्रयोग 7 संख्या के लिए होता है। यदि किसी छन्द के लक्षण में अश्व, हय, तुरंग आदि शब्द आएँ, तो वहाँ उनका संख्यात्मक मान ७ ग्रहण किया जाता है।
उदाहरणम्
ऽ ऽ ऽ । । ऽ । ऽ । । । ऽ ऽ ऽ । ऽ ऽ । ऽ
यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृदयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया।
कण्ठः स्तम्भितबाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्।
वैक्लव्यं मम तावदीदृशमिदं स्नेहादरण्यौकसः।
पीड्यन्ते गृहिणः कथन्नु तनयाविश्लेषदुःखैर्नवैः॥
—अभिज्ञानशाकुन्तलम् (4/6)
मन्दाक्रान्ता (प्रत्येक चरण में १७ अक्षर)
लक्षणम्
मन्दाक्रान्ता जलधिषडगैर्म्भौ नतौ ताद् गुरू चेत्॥
(वृत्तरत्नाकर ३/९७)
गणविन्यास
मगण + भगण + नगण + तगण + तगण + गुरु + गुरु
(म + भ + न + त + त + ग + ग)
हिन्दी अर्थ-जिस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः मगण, भगण, नगण, तगण, तगण तथा अन्त में दो गुरु वर्ण होते हैं, उसे मन्दाक्रान्ता छन्द कहते हैं। इस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः चौथे अक्षर, छठे अक्षर तथा सातवें अक्षर पर यति होती है।
अतिरिक्त जानकारी
- इस छन्द के प्रत्येक चरण में १७ अक्षर होते हैं।
- इसमें ४, ६ तथा ७ अक्षरों के बाद यति होती है। अर्थात् प्रत्येक चरण का विभाजन ४ + ६ + ७ अक्षरों में होता है।
- छन्दशास्त्र में ‘जलधि’ शब्द का प्रयोग भूतसंख्या के रूप में ४ के लिए किया जाता है, क्योंकि चार समुद्र माने गए हैं।
- ‘षड्’ का अर्थ ६ है।
- इसलिए “जलधिषडगैः” का तात्पर्य ४ + ६ + ७ अक्षरों पर यति से है।
- महाकवि कालिदास ने अपने प्रसिद्ध काव्य मेघदूतम् की रचना इसी छन्द में की है, इसलिए यह छन्द अत्यन्त लोकप्रिय है
- शास्त्रीय परम्परा में “जलधि = ४” का आधार चार दिशाओं में स्थित चार समुद्रों की कल्पना है। विभिन्न पुराणों में समुद्रों की अनेक सूचियाँ मिलती हैं, परन्तु चार जलधियों का उल्लेख सामान्यतः दिशानुसार इस प्रकार किया जाता है—
- पूर्व समुद्र (पूर्व दिशा का समुद्र)
- दक्षिण समुद्र (दक्षिण दिशा का समुद्र)
- पश्चिम समुद्र (पश्चिम दिशा का समुद्र)
- उत्तर समुद्र (उत्तर दिशा का समुद्र)
- इसी कारण जलधि शब्द का प्रयोग भूतसंख्या में ४ के लिए किया जाता है।
छन्दशास्त्र की भूतसंख्या में पर्वत शब्द का प्रयोग प्रायः ७ (सात) के लिए किया जाता है, क्योंकि भारतीय परम्परा में सप्त कुलपर्वत प्रसिद्ध हैं।
सप्त प्रसिद्ध पर्वत (सप्त कुलपर्वत)
- महेन्द्र
- मलय
- सह्य
- शुक्तिमान्
- ऋक्ष (या ऋक्षवान्)
- विन्ध्य
- पारियात्र (या पारिपात्र)
उदाहरणम्
कश्चित्कान्ताविरहगुरुणा स्वाधिकारात्प्रमत्तः।
शापेनास्तङ्गमितमहिमा वर्षभोग्येण भर्तुः॥
यक्षश्चक्रे जनकतनयास्नानपुण्योदकेषु।
स्निग्धच्छायातरुषु वसतिं रामगिर्याश्रमेषु॥
वसन्ततिलका (प्रत्येक चरण में १४ अक्षर)
लक्षणम्
उक्ता वसन्ततिलका तभजा जगौ गः॥
(वृत्तरत्नाकर 3/79)
गणन्यास
तगण + भगण + जगण + जगण + गुरु + गुरु
हिन्दी अर्थ- जिस छन्द के प्रत्येक चरण में क्रमशः तगण, भगण, जगण, जगण तथा अंत में दो गुरु वर्ण (गुरु + गुरु ) होते हैं, उसे वसन्ततिलका छन्द कहते हैं।
अतिरिक्त जानकारी-
वसन्ततिलका छन्द – अतिरिक्त जानकारी
- नाम का अर्थ
वसन्ततिलका दो शब्दों से मिलकर बना है—
- वसन्त = ऋतुओं का राजा, नवीनता, सौन्दर्य और उल्लास का प्रतीक।
- तिलका = मस्तक पर लगाया जाने वाला तिलक, जो शोभा और सौन्दर्य को बढ़ाता है।
अर्थात् जो छन्द वसन्त ऋतु की भाँति मधुर, मनोहर और शोभायुक्त हो, उसे “वसन्ततिलका” कहते हैं।
- छन्द का स्वरूप
- यह वर्णिक समवृत्त छन्द है।
- प्रत्येक चरण में 14 वर्ण होते हैं।
- गण-विन्यास—
तगण + भगण + जगण + जगण + गुरु + गुरु
- यति- सामान्यतः 8वें वर्ण के बाद यति (विराम) मानी जाती है।
- विशेषता
- यह छन्द मधुर, गम्भीर और प्रभावशाली है।
- इसमें प्रसाद और माधुर्य दोनों गुणों का सुंदर समन्वय मिलता है।
- संस्कृत काव्य में इसका व्यापक प्रयोग हुआ है।
- प्रयोग
इस छन्द का उपयोग विशेष रूप से निम्न विषयों के वर्णन में किया जाता है—
- देव-स्तुति
- गुरु-वन्दना
- प्रकृति-वर्णन
- ऋतु-वर्णन
- नीति एवं उपदेश
- भक्ति एवं दार्शनिक विषय
- प्रसिद्ध उदाहरण
महाकवियों ने इस छन्द का प्रयोग अनेक स्तोत्रों एवं काव्यों में किया है। इसकी मधुर लय के कारण यह अत्यन्त लोकप्रिय छन्दों में गिना जाता है।
उदाहरणम्
यात्येकतोऽस्तशिखरं पतिरोषधीनाम्
आविष्कृतोऽरुणपुरस्सर एकतोऽर्कः।
तेजोद्वयस्य युगपद्व्यसनोदयाभ्यां
लोको नियम्यत इवात्मदशान्तरेषु॥ (शाकुन्तलम् 4/11)
भुजङ्गप्रयात (प्रत्येक चरण में १२ अक्षर)
लक्षणम्
भुजङ्गप्रयातं भवेद्यैश्चतुर्भिः॥
(वृत्तरत्नाकर ३/५५)
गणन्यास
यगण + यगण + यगण + यगण
हिन्दी अर्थ- जिस छन्द के प्रत्येक चरण में चार यगण होते हैं, उसे भुजङ्गप्रयात छन्द कहते हैं।
अतिरिक्त जानकारी-
नाम की व्युत्पत्ति (नाम-व्याख्या)
भुजङ्गप्रयात शब्द दो पदों से मिलकर बना है—
- भुजङ्ग = सर्प (साँप)
- प्रयात = गमन करने वाला, चलने की चाल
अर्थात् जिस छन्द की गति सर्प के लहराते हुए चलने के समान प्रतीत होती है, उसे भुजङ्गप्रयात छन्द कहते हैं।
- छन्द का प्रकार
- वर्णिक समवृत्त छन्द।
- चारों चरण समान वर्ण-विन्यास वाले होते हैं।
यति
सामान्यतः 6वें वर्ण के बाद यति (विराम) मानी जाती है।
- विशेषताएँ
- इस छन्द की गति अत्यन्त मधुर, प्रवाहपूर्ण और लहरदार होती है।
- पढ़ने पर सर्प की चाल जैसी तरंगमयी लय का अनुभव होता है।
- उच्चारण में सरल तथा कर्णप्रिय होने के कारण यह अत्यन्त लोकप्रिय छन्द है।
प्रयोग
भुजङ्गप्रयात छन्द का प्रयोग मुख्यतः निम्न विषयों में किया जाता है—
- देव-स्तुति
- भक्ति-स्तोत्र
- गुरु-वन्दना
- तीर्थ-महिमा
- प्रकृति-वर्णन
- दार्शनिक एवं आध्यात्मिक भाव
उदाहरणम्
भुजङ्गप्रयात छन्द का सर्वाधिक प्रामाणिक एवं प्रसिद्ध उदाहरण सुब्रह्मण्यभुजङ्गम् से है।
सदा बालरूपाऽपि विघ्नाद्रिहन्त्री
महादन्तिवक्त्राऽपि पञ्चास्यमान्या।
विधीन्द्रादिमृग्या गणेशाभिधा मे
विधत्तां श्रियं काऽपि कल्याणमूर्तिः॥
छन्दः — भुजङ्गप्रयातम्
रचयिता — आदि शङ्कराचार्य
सरल हिन्दी भावार्थ
जो भगवान् गणेश बालक के समान रूप धारण करने पर भी विघ्नरूपी पर्वतों का नाश करने वाले हैं, हाथी के समान मुख वाले होते हुए भी पंचमुख शिव द्वारा पूजित हैं, ब्रह्मा और इन्द्र आदि देवताओं द्वारा वन्दनीय हैं, वे कल्याणस्वरूप श्रीगणेश मुझे समृद्धि एवं मंगल प्रदान करें।
शिखरिणी (प्रत्येक चरण में १७ अक्षर)
लक्षणम्
रसै: रुद्रैश्छिन्ना यमनसभलागा शिखरिणी॥
(वृत्तरत्नाकर ३/९३)
गणन्यास
यगण + मगण + नगण + सगण + भगण + लघु + गुरु
हिन्दी अर्थ- जिस छन्द के प्रत्येक चरण में 6वें और 11वें वर्ण पर यति (विराम) हो तथा क्रमशः यगण, मगण, नगण, सगण, भगण और अंत में एक लघु तथा एक गुरु वर्ण हो, उसे शिखरिणी छन्द कहते हैं।
अतिरिक्त जानकारी
नाम की व्युत्पत्ति
शिखरिणी शब्द ‘शिखर’ से बना है।
- शिखर = पर्वत की चोटी, सर्वोच्च भाग।
- शिखरिणी = शिखर से युक्त, शिखर के समान ऊँची एवं शोभायुक्त।
अर्थात् जिस छन्द की गति ऊँची, गरिमामयी, सुन्दर तथा शिखर के समान उन्नत प्रतीत होती है, उसे शिखरिणी छन्द कहते हैं। इसकी लय क्रमशः ऊपर उठती हुई अनुभव होती है, इसलिए इसका नाम शिखरिणी रखा गया है।
छन्द का प्रकार
- वर्णिक समवृत्त छन्द।
- चारों चरणों में समान वर्ण-संख्या एवं समान गण-विन्यास होता है।
वर्ण-संख्या
- प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं।
यति
- 6वें वर्ण के बाद प्रथम यति।
- 11वें वर्ण के बाद द्वितीय यति।
इसी तथ्य को सूत्र में “रसैः” (6) तथा “रुद्रैः” (11) शब्दों द्वारा स्मरण कराया गया है।
विशेषताएँ
- यह छन्द अत्यन्त मधुर, गंभीर और गरिमामय माना जाता है।
- इसकी लय स्वाभाविक, संतुलित तथा प्रभावशाली होती है।
- भावों की क्रमिक उन्नति और सौन्दर्य की अभिव्यक्ति के लिए यह अत्यन्त उपयुक्त है।
प्रयोग
शिखरिणी छन्द का प्रयोग मुख्यतः निम्न विषयों में किया जाता है—
- देव-स्तुति
- गुरु-वन्दना
- प्रकृति-वर्णन
- ऋतु-वर्णन
- भक्ति-काव्य
- श्रृंगार तथा शान्त रस
- दार्शनिक एवं आध्यात्मिक विषय
प्रसिद्ध प्रयोग
संस्कृत के अनेक महाकवियों, जैसे कालिदास, माघ तथा श्रीहर्ष ने विभिन्न काव्यों में इस छन्द का प्रयोग किया है। अनेक स्तोत्रों और मुक्तक-काव्यों में भी यह छन्द मिलता है।
उदाहरणम्
न मन्त्रं नो यन्त्रं तदपि च न जाने स्तुतिमहो
न चाह्वानं ध्यानं तदपि च न जाने स्तुतिकथाः।
न जाने मुद्रास्ते तदपि च न जाने विलपनं
परं जाने मातस्त्वदनुसरणं क्लेशहरणम्॥ १॥
छन्द
शिखरिणी
सरल हिन्दी भावार्थ
हे माँ! मैं न तो मन्त्र जानता हूँ, न यन्त्र; न ही आपकी उत्तम स्तुति करना जानता हूँ। मुझे आपका आवाहन, ध्यान तथा आपके गुणों का वर्णन भी नहीं आता। मैं आपकी पूजा की मुद्राएँ भी नहीं जानता और न ही उचित प्रकार से प्रार्थना करना जानता हूँ। किन्तु मैं इतना अवश्य जानता हूँ कि आपकी शरण ग्रहण करना ही सभी क्लेशों का नाश करने वाला है।
स्रोत
- ग्रन्थ — देव्यपराधक्षमापनस्तोत्रम्
- रचयिता — आदि शङ्कराचार्य