पाठ्यपुस्तक के अभ्यास प्रश्नोत्तर
१. संस्कृतेन उत्तरं देयम्—
(क) अयं पाठः कस्मात् ग्रन्थात् सङ्कलितः?
उत्तरम्— अयं पाठः ‘वाल्मीकि-रामायणम्’ ग्रन्थात् सङ्कलितः।
(ख) जटिलः चीरवसनः भुवि पतितः कः आसीत् ?
उत्तरम्— जटिलः चीरवसनः भुवि पतितः भरतः आसीत्।
(ग) रामः कं पाणिना परिजग्राह?
उत्तरम्— रामः भरतं पाणिना परिजग्राह।
(घ) भरतं कः अपृच्छत्?
उत्तरम्— भरतं रामः अपृच्छत्।
(ङ) राज्ञां विजयमूलं किं भवति?
उत्तरम्— शास्त्रकोविदैः मन्त्रिधुरैः अमात्यैः सुसंवृतः मन्त्रः राज्ञां विजयमूलं भवति।
(च) राज्ञः कृते कीदृशः अमात्यः क्षेमकरः भवेत् ?
उत्तरम्— मेधावी, शूरः, दक्षः, विचक्षणः च एकोऽपि अमात्यः राज्ञः कृते क्षेमकरः भवेत्।
(छ) सेनापतिः कीदृग् गुणयुक्तः भवेत् ?
उत्तरम्— सेनापतिः धृष्टः, शूरः, धृतिमान्, मतिमान्, शुचिः, कुलीनः, अनुरक्तः च एतैः गुणैः युक्तः भवेत्।
(ज) बलेभ्यः यथाकालं किं दातव्यम्?
उत्तरम्— बलेभ्यः यथाकालं भक्तं च वेतनं च दातव्यम्।
(झ) मन्त्रः कीदृशः भवति ?
उत्तरम्— बहुभिः सह न मन्त्रितः मन्त्रः भवति।
(ञ) मेधावी अमात्यः राजानं कां प्रापयेत्?
उत्तरम्— मेधावी अमात्यः राजानं महतीं श्रियं प्रापयेत्।
२. रिक्तस्थानपूर्तिः क्रियताम्—
(क) रामः ददर्श दुर्दर्शं युगान्ते भास्करं यथा।
(ख) अङ्के भरतम् आरोप्य रामः सादरं पर्यपृच्छत्।
(ग) कच्चित् काले अवबुध्यसे?
(घ) पण्डितः हि अर्थकृच्छ्रेषु महत् निःश्रेयसं कुर्यात्।
(ङ) श्रेष्ठाञ्छ्रेष्ठेषु कच्चित् एवं कर्मसु नियोजयसि।
३. सप्रसङ्गं मातृभाषया व्याख्यायेताम्—
(क) मन्त्रो विजयमूलं हि राज्ञां भवति राघव!
हिन्दी अर्थ- हे राघव! राजाओं की विजय का मूल कारण गुप्त मन्त्रणा (उचित सलाह और विचार-विमर्श) ही होती है।
प्रसङ्गः— जब भरत को श्रीराम के वनवास का समाचार प्राप्त हुआ, तब वे उन्हें पुनः अयोध्या लाने के दृढ़ संकल्प के साथ अपनी माताओं, गुरु वशिष्ठ तथा अयोध्या के अनेक नागरिकों सहित चित्रकूट पहुँचे। वहाँ पहुँचकर भरत ने अत्यन्त विनम्रता और श्रद्धा के साथ श्रीराम के चरणों में साष्टाङ्ग प्रणाम किया। श्रीराम ने प्रेमपूर्वक उन्हें उठाकर अपने समीप बैठाया और उनके साथ अयोध्या की स्थिति, प्रजा की कुशलता तथा राज्य-व्यवस्था के विषय में विस्तार से चर्चा की। इसी अवसर पर श्रीराम ने भरत को आदर्श शासन की शिक्षा देते हुए अनेक नीतिपरक प्रश्न पूछे। उन्होंने यह जानना चाहा कि क्या भरत ने राज्य-कार्य में ऐसे योग्य, बुद्धिमान, नीतिज्ञ और विश्वसनीय मंत्रियों को नियुक्त किया है, जो उचित परामर्श देकर राज्य के संचालन में सहायता करते हों। श्रीराम का मत था कि किसी भी राज्य की उन्नति, सुरक्षा और विजय का आधार योग्य मंत्रियों की गोपनीय मन्त्रणा और सुचिन्तित नीति होती है।
व्याख्या—
राजा की सफलता और विजय का आधार उसके योग्य एवं बुद्धिमान मंत्रियों की गोपनीय मन्त्रणा होती है। जो मंत्री शास्त्रों के ज्ञाता, नीतिशास्त्र में पारंगत तथा दूरदर्शी होते हैं, वे देश, काल और परिस्थितियों का समुचित आकलन करके राजा को उचित सलाह देते हैं। उन्हें राज्य-व्यवस्था, कूटनीति तथा शत्रु की गतिविधियों का गहन ज्ञान होता है। वे समयानुकूल निर्णय लेने, संभावित संकटों का पूर्वानुमान लगाने तथा उनसे बचने के प्रभावी उपाय सुझाने में सक्षम होते हैं। उनके विवेकपूर्ण परामर्श से राजा उचित निर्णय लेता है, जिससे राज्य की सुरक्षा, समृद्धि और विजय सुनिश्चित होती है। इसलिए किसी भी राज्य के सुचारु संचालन में योग्य मंत्रियों का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना गया है।
(ख) कच्चित्ते मन्त्रितो मन्त्रो राष्ट्रं न परिधावति!
हिन्दी अर्थ- क्या तुम्हारी गुप्त मन्त्रणा (गुप्त सलाह) शत्रु-राष्ट्र में तो नहीं फैल जाती है?
उत्तरम्-
प्रसंग- यह वचन वाल्मीकि रामायण के अयोध्याकाण्ड से लिया गया है। चित्रकूट में भरत से भेंट होने पर श्रीराम आदर्श राजधर्म का उपदेश देते हुए उनसे राज्य-व्यवस्था से सम्बन्धित अनेक प्रश्न पूछते हैं। उन्हीं प्रश्नों में वे यह जानना चाहते हैं कि कहीं राज्य की गुप्त मन्त्रणाएँ शत्रु-राष्ट्र तक तो नहीं पहुँच जातीं। इस प्रकार श्रीराम भरत को गुप्त मन्त्रणा के महत्त्व का बोध कराते हैं।
व्याख्या- श्रीराम इस प्रश्न के माध्यम से राजा को सावधानी और विवेक का संदेश देते हैं। वे बताते हैं कि राज्य के महत्त्वपूर्ण विषयों पर विचार करते समय न तो अकेले निर्णय लेना उचित है और न ही बहुत अधिक लोगों को उसमें सम्मिलित करना चाहिए। अकेले विचार करने से उचित समाधान नहीं मिल पाता, जबकि अधिक लोगों के सम्मिलित होने से गोपनीयता भंग होने की आशंका रहती है। यदि राज्य की गुप्त योजनाएँ शत्रु के हाथ लग जाएँ, तो वह पहले से ही अपनी रणनीति बनाकर राज्य को हानि पहुँचा सकता है। इसलिए राजा को केवल अत्यन्त विश्वसनीय और बुद्धिमान मन्त्री के साथ ही गुप्त मन्त्रणा करनी चाहिए। यही नीति राज्य की सुरक्षा, सफलता तथा विजय का आधार बनती है।
४. प्रथमनवमश्लोकयोः स्वमातृभाषया अनुवादः क्रियताम्।
उत्तरम्—
1.श्लोकः-
जटिलं चीरवसनं प्राञ्जलिं पतितं भुवि।
ददर्श रामो दुर्दर्शं युगान्ते भास्करं यथा॥
हिन्दी अनुवाद – श्रीराम ने जटाधारी, चीर (वल्कल) वस्त्र धारण किए हुए, हाथ जोड़कर पृथ्वी पर गिरे हुए भरत को देखा। वे ऐसे दिखाई दे रहे थे, जैसे प्रलयकाल में देखने में कठिन सूर्य दिखाई देता है।
9.श्लोक :
कच्चित्सहस्रान्मूर्खाणामेकमिच्छसि पण्डितम्।
पण्डितो ह्यर्थकृच्छ्रेषु कुर्यान्निःश्रेयसं महत्॥
हिन्दी अनुवाद : क्या तुम हजार मूर्खों की अपेक्षा एक विद्वान् व्यक्ति को ही चुनते हो? क्योंकि विद्वान् व्यक्ति कठिन परिस्थितियों में महान् कल्याण करता है।
५. अधोलिखितानां उचितमर्थं कोष्ठकात् चित्वा लिखत—
(आलिंगन करके, सूँघकर, कठिनाई से देखने योग्य, निपुण, सेना का, शिर में, कल्याण को )
-
- दुर्दर्शम् = कठिनाई से देखने योग्य
- परिष्वज्य = आलिंगन करके
- आघ्राय = सूँघकर
- मूर्ध्नि = शिर में
- निःश्रेयसम् = कल्याण को
- विचक्षणः = निपुण
- बलस्य = सेना का
६. विपरीतार्थमेलनं क्रियताम्—
उत्तरम्—
एकः — बहुः
क्षिप्रम् — शनैः
पण्डितः — मूर्खः
महत् — लघु
७. सन्धिविच्छेदः क्रियताम्—
यथा— कुलीनश्च = कुलीनः + च
भृत्याश्च = भृत्याः + च
धृष्टश्च = धृष्टः + च
अनुरक्तश्च = अनुरक्तः + च
शूरश्च = शूरः + च
८. अधोलिखितेषु शब्देषु प्रकृतिं प्रत्ययं च पृथक् कुरुत—
पतितम्, आघ्राय, मन्त्रिणः, पण्डिताः, मेधावी, दातव्यम्, स्मृतः
उत्तरम्—
| शब्द | प्रकृति + प्रत्यय |
| पतितम् | पत् + क्त |
| आघ्राय | आ + घ्रा+ ल्यप् |
| मन्त्रिणः | मन्त्र + णिनि, प्रथमा बहुवचन |
| पण्डिताः | पण्डा + इतच्, प्रथमा बहुवचन |
| मेधावी | मेधा + विनि, प्रथमा एकवचन |
| दातव्यम् | दा + तव्यत् |
| स्मृतः | स्मृ + क्त |